अधूरी सांसें, अमर प्रेम

 अधूरी सांसें, अमर प्रेम

कहानी की शुरुआत किसी बड़े शहर की चकाचौंध में नहीं, बल्कि अगस्त्यमुनि (Augustmuni) कॉलेज की उन शांत वादियों में हुई थी। मंदाकिनी नदी का शोर और पहाड़ों की ठंडी हवाओं के बीच, मनीष ने पहली बार सृष्टि को कॉलेज की सीढ़ियों पर देखा था।

वह साधारण सी पहाड़ी लड़की थी, जिसकी आँखों में चमक और चेहरे पर एक मासूम सी मुस्कान थी। जब मेने सृष्टि को पहली बार देखा तो मुझे मेरी सांसे कुछ समय के लिए थम सी गयी थी, लेकिन सृष्टि ने मेरा प्रोपोस को पहली बार रिजेक्ट कर दिया था और उसे मनाते मनाते मुझे लगभग 1 साल हो गया था जो भी सृष्टि से collage में बात करता मुझे बहुत गुस्सा आता और उससे लड़ाई कर देता था और अंत में सृष्टि मान गयी। 

कॉलेज की कैंटीन की चाय और अगस्त्यमुनि के ग्राउंड की शामों ने उनकी दोस्ती को प्यार में बदल दिया। वो आठ साल... जिनमें उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई पूरी की, साथ में सपने देखे।

अगस्त्यमुनि कॉलेज की पढ़ाई खत्म हो चुकी थी। करियर बनाने की दौड़ में मै(मनीष) देहरादून चला आया था और सृष्टि अपने गाँव में ही थी। फोन पर घंटों बातें होती, लेकिन मिलने का सिलसिला कम हो गया था।

शुरुआत में सृष्टि ने अपनी तबीयत के बारे में मनीष को कुछ नहीं बताया। उसे लगा कि पहाड़ की ठंड है, शायद इसलिए हल्की खांसी और बुखार है। जब भी मनीष फोन पर पूछता, "कैसी हो?" तो वह अपनी खांसी को दबाकर हंसते हुए कहती, "बिल्कुल ठीक हूँ, बस तुम्हारी याद आ रही है।"

लेकिन समय बीतता गया और वह 'हल्की खांसी' एक गहरी और दर्दनाक आवाज़ में बदल गई। सृष्टि का वजन तेजी से गिरने लगा। उसके गाल पिचक गए और आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए। वह लड़की, जो कॉलेज के किसी भी फंक्शन में सबसे आगे रहती थी, अब बिस्तर से उठने में भी थकान महसूस करती थी।

एक दिन मै(मनीष) उसे सरप्राइज देने अचानक उसके गाँव पहुंच गया।

जब उसने सृष्टि को देखा, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। वह सृष्टि, जो कभी मंदाकिनी नदी की तरह चंचल थी, आज मुरझाए हुए फूल जैसी लग रही थी।

मनीष ने घबराते हुए पूछा, "सृष्टि, ये क्या हाल बना रखा है? तुम इतनी कमजोर कैसे हो गई?"

सृष्टि ने नज़रें चुरा लीं। वह नहीं चाहती थी कि मनीष उसके लिए परेशान हो। लेकिन मेरी(मनीष) की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा। उसने अपने तकिए के नीचे से एक मेडिकल फाइल निकाली और कांपते हाथों से मनीष की ओर बढ़ा दी।

कमरे में सन्नाटा था। मनीष ने फाइल खोली। रिपोर्ट के पन्नों पर लिखे शब्द किसी हथौड़े की तरह उसके दिमाग पर लगे और मनीष का दिमाग हिल गया —"Pulmonary Tuberculosis - Advanced Stage"

  मनीष की आँखों में आंसू भर आए। उसने फाइल मेज      पर पटकी और सृष्टि के कंधे पकड़कर उसे झकझोरा, "तुमने मुझे बताया क्यों नहीं? तुम पागल हो क्या?"

  सृष्टि की आँखों से आंसू बह निकले। उसने धीरे से कहा, "मुझे लगा ठीक हो जाएगा, मनीष। मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती थी। हम शादी की बात करने वाले थे ना? मुझे डर था कि कहीं मेरी बीमारी हमारी खुशियों के बीच न आ जाए।"

मनीष ने उसे गले लगा लिया, इतना जोर से जैसे वह उसे मौत से खींच लाना चाहता हो। उसकी आवाज़ भारी हो गई, "सृष्टि, तुम ही मेरी खुशी हो। अगर तुम्हें कुछ हो गया, तो मेरी दुनिया में कुछ नहीं बचेगा। आज से तुम्हारा इलाज मेरी जिम्मेदारी है।"

उस दिन अगस्त्यमुनि की उस शाम में एक डर घुल गया था। मनीष ने वादा तो कर लिया था, लेकिन रिपोर्ट की तारीखें और बीमारी की गंभीरता बता रही थी कि समय उनके हाथ से फिसलता जा रहा है।

मनीष ने एक पल की भी देरी नहीं की। वह तुरंत सृष्टि को लेकर देहरादून आ गया। अगस्त्यमुनि की खुली हवाओं से दूर, अब सृष्टि की दुनिया अस्पताल के एक सफेद कमरे और दवाओं की गंध तक सिमट गई थी।

इलाज शुरू हुआ, लेकिन यह किसी जंग से कम नहीं था। दिन भर में ढेर सारी दवाइयां, भारी इंजेक्शन और लगातार चलती ऑक्सीजन। मनीष ने अपनी नौकरी, अपना चैन, सब कुछ दांव पर लगा दिया था।

शुरुआत में लगा कि शायद प्यार जीत जाएगा। मनीष अक्सर सृष्टि का मन बहलाने के लिए पुराने किस्से छेड़ देता।

"याद है सृष्टि? जब तुम कॉलेज के फर्स्ट ईयर में थी तब हम मंदाकिनी नदी के किनारे बैठे थे और तुमने कहा था कि तुम्हें पहाड़ों से कभी दूर नहीं जाना?" मनीष ने उसके बिखरे बालों को संवारते हुए कहा।

सृष्टि, जिसके चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क लगा था, ने फीकी मुस्कान के साथ सिर हिलाया। उसकी आवाज़ अब बहुत कम निकलती थी। उसने इशारे से मनीष को पास बुलाया और बहुत धीमे से फुसफुसाई, "मनीष... तुम थक गए हो। सो जाओ ना।"

मनीष की आँखों में नमी आ गई। वह खुद टूट रहा था, लेकिन सृष्टि को जोड़े हुए था। "मैं नहीं थका पगली, मुझे तो बस तुम्हें ठीक करके अगस्त्यमुनि वापस ले जाना है," उसने झूठ बोला।

लेकिन जैसे-जैसे महीने बीते, उम्मीद की किरणें धुंधली पड़ने लगीं। Pulmonary Tuberculosis अब केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं था, वह धीरे-धीरे उसकी हड्डियों और शरीर के बाकी हिस्सों को भी जकड़ रहा था। दवाइयों ने काम करना बंद कर दिया था। सृष्टि का           शरीर दवाइयों की गर्मी से जलता रहता, और खांसी के साथ खून आना अब आम बात हो गई थी।

26 दिसम्बर 2025 की रात 11 बजे , सृष्टि ने  मुझे (मनीष ) को  फ़ोन करके देहरादून  बुलाया  और वहा  सृष्टि के फॅमिली वाले भी आये थे  डॉक्टर ने मुझे (मनीष) को अपने केबिन में बुलाया। डॉक्टर का चेहरा गंभीर था।

"मनीष," डॉक्टर ने चश्मा मेज पर रखते हुए कहा, "मुझे अफ़सोस है। संक्रमण Multi-Drug Resistant (MDR-TB) के स्तर पर पहुँच चुका है। उसके फेफड़े अब जवाब दे रहे हैं। हम सिर्फ़ उसका दर्द कम कर सकते हैं, लेकिन... उसे बचाना अब हमारे हाथ में नहीं है।"

मनीष को लगा जैसे किसी ने उसका गला घोंट दिया हो। वह चिल्लाना चाहता था, रोना चाहता था, डॉक्टर का गिरेबान पकड़ना चाहता था, लेकिन वह बस सुन्न खड़ा रहा।

जब वह वापस सृष्टि के कमरे में गया, तो उसने अपने आंसुओं को पोंछ लिया और चेहरे पर एक झूठी मुस्कान चिपका ली। लेकिन सृष्टि उसे 8 साल से जानती थी। वह उसकी हंसी के पीछे का दर्द पढ़ सकती थी।

सृष्टि ने अपनी बची-खुची ताकत समेटकर मनीष का हाथ अपने गाल पर रखा। उसकी आँखों में मौत का डर नहीं, बल्कि मनीष के छूटने का गम था।

"डॉक्टर ने जवाब दे दिया ना?" सृष्टि की आवाज़ इतनी धीमी थी कि सिर्फ़ मनीष सुन सकता था।

मैंने (मनीष) ने उसके होंठों पर उंगली रखी, "शशश... कुछ नहीं होगा। हम लड़ेंगे।"

मनीष ने सृष्टि को बिस्तर पर लेटाया और खुद उसके सिराहने बैठ गया। उसने सृष्टि का सिर अपनी गोद में रख लिया। सृष्टि की सांसें अब बहुत उखड़ रही थीं। हर सांस के साथ एक घरघराहट की आवाज़ आ रही थी, जो मनीष के दिल को चीर रही थी।

सृष्टि ने धीरे से अपनी आंखें खोलीं। उसकी नज़रें धुंधली हो रही थीं, लेकिन उनमें मनीष का चेहरा साफ था। उसने अपना हाथ उठाने की कोशिश की, लेकिन शरीर में जान नहीं बची थी। मनीष समझ गया, उसने तुरंत अपना हाथ उसके गाल पर रख दिया।

"मनीष..." सृष्टि की आवाज़ इतनी धीमी थी कि मनीष को अपना कान उसके होठों के पास ले जाना पड़ा।

"हम्म... मैं यहीं हूँ, जान। कहीं नहीं जा रहा," मनीष ने अपने आंसुओं को रोकते हुए कहा।

"रोओगे... नहीं ना?" सृष्टि ने रुक-रुक कर कहा। "वादा करो... तुम अपनी... जिंदगी... खुशी से... जिओगे।" और तुम किसी अच्छी लडकी से शादी करना और तुम्हारी बेटी के रूप में में जरुर तुम्हारे पास आउंगी तुम्हारी बेटी बनकर 

मनीष का बांध टूट गया। आंसू उसकी आँखों से गिरकर सृष्टि के गालों पर पड़ने लगे। "कैसे जिऊंगा सृष्टि? तुम ही तो मेरी जिंदगी हो। तुम्हारे बिना मैं कुछ नहीं हूँ।"

सृष्टि ने बहुत मुश्किल से एक हल्की मुस्कान दी। "हम... फिर मिलेंगे, 

मनीष ने उसे कसकर पकड़ लिया, "हाँ, हम फिर मिलेंगे। मैं इंतज़ार करूँगा सृष्टि।

सृष्टि की पकड़ मनीष के हाथ पर सख्त हुई, उसने एक गहरी, लंबी सांस ली... उसकी आँखों में मनीष की छवि आखिरी बार चमकी... और फिर...

उसकी उंगलियों की पकड़ ढीली पड़ गई। सांसों की वो घरघराहट, जो पिछले कई महीनों से गूंज रही थी, अचानक थम गई।

कमरे में एक भयानक सन्नाटा छा गया। मनीष बस उसे देखता रहा। उसे लगा शायद वह अभी फिर से सांस लेगी, अभी कहेगी कि यह मज़ाक था। उसने उसे हिलाया, "सृष्टि? सृष्टि... आंखें खोलो!"

लेकिन सृष्टि जा चुकी थी। वह उन वादियों से बहुत दूर चली गई थी जहाँ से उनकी कहानी शुरू हुई थी।

मनीष ने एक जोर की चीख मारी, "सृष्टि!!" और अपना सिर उसके सीने पर रखकर फूट-फूटकर रोने लगा। आठ साल का वो प्यार, वो collage की दोस्ती, वो जवानी के सपने... सब उस एक पल में बिखर गए।


आज भी, लोग कहते हैं कि मनीष अक्सर अगस्त्यमुनि जाता है। वह घंटों कॉलेज की उन सीढ़ियों पर बैठा रहता है, जहाँ वे पहली बार मिले थे। वह अकेला होता है, लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सा सुकून होता है। शायद वह उस वादे को निभा रहा है—इंतज़ार करने का वादा।

उसकी (मनीष) की  डायरी के आखिरी पन्ने पर बस एक लाइन लिखी है: "कहानी खत्म नहीं हुई है सृष्टि, बस एक पन्ना पलटा है। अगले जनम में, कहानी वहीं से शुरू होगी जहाँ छोड़ी थी।"


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